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एक बार दे दे खुद को मुझको, मैं बहुत सँभाल कर रखूँगा तुझको
मैं रख रहा हूँ गिरवी खुद को, तू बस खरीद ले बेमोल मुझको
रात को मैं तेरा चाँद बनूँगा, सुबह को उगता सूरज
जाड़ों की मैं धूप बनूँगा, भरी दोपहर की छाँव
तू जब कहेगी बारिश की बूंद बनूँगा
तू जब कहेगी ओस बन बिखरूँगा
पतझड़ एक मौसम है, आएगा और चला जाएगा
पर मैं बसंत बनकर तेरे जीवन में, सारे फूल खिलाऊंगा
प्रकृति के पल-पल बदलते हरे गुण को, मैं तेरे जीवन में उतार लाऊंगा
तेरी मुस्कान बन, मैं तेरे होठों से लग जाऊँगा
जब तेरे दिल से आह उठेगी, मैं आँसू बन तेरी आँखों से बह जाऊँगा
मत डर, मत झिझक, खोल शर्म के परदे
मैं तेरा सतरँगो से परिचय करवाऊँगा
जब बात आएगी तेरी, मैं इस दुनियादारी को आग लगाऊँगा
कदम बढ़ा मेरी तरफ आ, आज़मा मुझे, मैं तेरा गरूर बन जाऊँगा
जी चुका हूँ पूरा एक दौर मैं भी, शराबों और शबाबों का
पर तेरी रूह के बग़ैर मैं चैन कहीं ना पाउँगा
बस ये मेहरबानी मुझ पर कर, मैं तेरी सारी कमी पूरी कर जाऊँगा
एक बार दे दे खुद को मुझको, मैं बहुत सँभाल कर रखूँगा तुझको|


– डॉ अनीता देशवाल

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